यज्ञ- परोपकारी उद्देश्य के साथ बलिदान.
एक निश्चित संकल्प को लेकर कोई रचनात्मक कार्य जो समाज के अधिकांश भाग के लिए उपयोगी हो सके वह यज्ञ है|
हिन्दू धर्मं में पौराणिक विचार (Mythological thought) अनुसार यज्ञ की यह परिभाषा है, परन्तु कोई भी कार्य जो समर्पण या पूर्ण करने के उद्धेश्य को लेकर किया जाये और जिससे संसार का भला हो वह यज्ञ है| इसे केवल किसी भी पूजा आदि कर्मकांड समझना उचित नहीं| इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति देश, समाज, परिवार, आदि के लिए जो कुछ भी करता है वे यज्ञ ही तो होता है|
यदि हम अपने प्रत्येक कार्य को एक यज्ञ के रूप में देखते हुए, सरे संसार के लिए समर्पण की भावना से करने लगेगें तो हम जीवन में यज्ञ का महत्व आसानी से समझ सकेंगें|
हालांकि यज्ञ का अर्थ सेक्रिफाईस (Sacrifice), ओब्लेशन (Oblation), इम्मोलेशन (Immolation), त्याग, यज्ञ, न्योछावर, हानि, निछावार, समर्पण, बलि, आहुती, बलिदान, क़ुरबान, आदि शब्द के रूप में अंग्रेजी हिंदी, या उर्दू में दिया गया है जो यज्ञ के ही पर्यायवाची शब्द होते है|
सामान्य अर्थ अनुसार हिन्दू धर्म में यज्ञ से तात्पर्य या यज्ञ का
अर्थ कर्म काण्ड माना जाता है| यज्ञ की व्यवस्था अनुसार अग्नि और घी के होम या
आहुती के लिए किया गया प्रतीकात्मक क्रिया है| आयुर्वेद और औषधीय विज्ञान अनुसार इससे उत्पन्न होने वाली गंध, धुवाँ, 'यज्ञ' शब्द के
प्रचार प्रसार का कारण बने हुऐ हैंं|
वर्तमान विचार से हिन्दू धर्म के अनुयायियों में
यज्ञ शब्द के तीन अर्थ हैं-
१- देवपूजा, २- दान, ३- संगतिकरण। यहाँ संगतिकरण का अर्थ है- संगठन।
यहाँ यज्ञ से तात्पर्य है- त्याग, बलिदान, शुभ कर्म।
इससे प्रतीत होता है की हम यज्ञ के माध्यम से अपने प्रिय खाद्य पदार्थों एवं
मूल्यवान् सुगंधित पौष्टिक एवं ओषधीय द्रव्यों को अग्नि एवं वायु के माध्यम से
समस्त संसार के कल्याण के लिए यज्ञ द्वारा वितरित किया जाता है| इससे वायु शोधन से सबको आरोग्यवर्धक वातावरण बनता है| हवन हुए समर्पित द्रव्य वायुभूत होकर संसार के समस्त प्राणिमात्र को
अनायास ही प्राप्त होते हैं, जो उनके स्वास्थ्यवर्धन, रोग निवारण में सहायक होते हैं|
एक प्रकार से यह ठीक है| जब हम समाज के लिए कुछ अच्छा करना, या सकारात्मक करना चाहते है तो उस बात की उपमा मिष्टान से करते है, अप्रिय की कड़वाहट से, इस लिए मधुरता बंटाना एक प्रकार से समाज को लाभ बाँटने के सामान ही कहा जायेगा|
यदि हम पौराणिक यज्ञ के समय उच्चरित संगीत मय वेद मन्त्रों की
शब्द ध्वनि आकाश में व्याप्त होकर लोगों के अंतःकरण को सात्विक एवं शुद्ध बनाती
है। इस प्रकार कम खर्च एवं प्रयत्न से सारे जगत की बड़ी सेवा हो जाती है|
इसको इस प्रकार समझा जा सकता है की एक मिर्च खाने
से एक व्यक्ति को उदर (पेट) अग्नि वृधी होकर पाचन होगा, पर पीसी गई उसी मिर्च से दो या अधिक व्यक्ति लाभ उठा पायेंगें| पर यदि वाही मिर्च आग पर डाली जाये तो उसका प्रभाव
आस-पास के कई व्यक्तियों पर होगा| त्वचा, नेत्र
आदि माध्यम से शरीर में प्रविष्ट होकर कई अंगों की अग्नि को प्रभावित कर देगी|
इसी प्रकार यज्ञ के माध्यम से उन द्रव्यं के
पोष्टिक एवं ओषधीय गुणों का लाभ अधिकांश को मिल जाता है|
पौराणिक काल में ऋषियों द्वार यज्ञों करने के कई
उदाहरण मिलते हैं| पौराणिक कथा कहानियों से यह भी ज्ञात होता है की
राक्षस एवं अज्ञानी लोग यज्ञ का विद्भंस करते थे| इसका
अर्थ यह भी है की कई लोग यज्ञ में आहुती डालने के
अपेक्षा सीधे खा लेना अधिक उपयुक्त मान इस प्रक्रिया का विरोध करते रहते थे|
अन्य दृष्टि से विचार किया जाये तो यज्ञ शालायें
उस समय की प्रयोग शालाएं होती रही होंगीं, जहाँ
विभिन्नजड़ीं बुटिओं , खनिजों धातुओं, आदि
द्रव्यों के माध्यम से विभिन्न प्रकार की ओषधि, अस्त्र, शस्त्र, एवं जनोपयोगी सामग्री का निर्माण किया जाता रहा
होगा,संभव है इसीं कारण से विरोधी नष्ट करते रहे होंगे|
वर्तमान में भी आयुर्वेद सहित सभी चिकित्सा
पद्धतियों में ओषधि निर्माण में अग्नि का बड़ा महत्व है| रसायन शाला से लेकर आयुध निर्माण शालाओं में बिना
अग्नि ( भट्टी) काम नहीं हो सकता|
एक निश्चित संकल्प को लेकर कोई रचनात्मक कार्य
जिससे दवाये, आयुध, पिस्तौल
से लेकर राकेट प्रक्षेपणास्त्र आदि तक का निर्माण किया जाना भी क्या यह भी यज्ञ नहीं है|
जन्म से मृत्यु तक की प्रक्रिया एक यज्ञ का ही रूप
है, इसमें देनिक जीवन यापन विषयक व्यापर, वृत्ति, रोजगार, नोकरी, सेवा, आदि आदि सभी कार्य भी यज्ञ कहाते है|
जब तक कोई कर्म (कार्य) किसी स्वार्थ से नहीं
जुड़ता तब तक हम उस कार्य को पूर्ण इच्छा से नहीं कर पाते, किसी भी व्यक्ति के द्वारा किया जाने वाला कोई भी कार्य (कर्म)
प्रकारांतर से अन्य कई के लिये भी उपयोगी सिद्ध होता है| फिर यदि हम उसी कार्य को करने से पूर्व केवल यह मान लें, की यह अन्यों के लिए भी लाभकारी होने से ईश्वर के लिए कर रहे हें, तो ईससे उस कार्य (कर्म) से अनायास ही अन्य के लाभ- हानी का विचार भी
उत्पन्न होगा, और हम उस हानि करने वाले कर्म (कार्य) को करने से
बच सकेंगें| इससे न केवल हमारे मन को अपितु परिवार को अनजाने
ही सुख सम्रद्धि का द्वार खुल जायेगा, और यही सबसे बड़ा यज्ञ होगा|
हम सब जहां से भी जिस कार्य को भी कर रहे हैं यदि
उसे सारे समाज के लिए किये जाने वाला कार्य मान कर करते रहते हें, तो वह “ यज्ञ” ही होगा, चाहे वह स्वयं के लिए या परिवार के लिए उदर पालन, सुख सुविधा आदि के लिए स्वार्थ वश भी किया जाने वाला कार्य ही क्यों
न हो|
फिर यदि वह कार्य हम समाज, प्रदेश, और देश, और मानवता के लिए करते है
तो क्रमश: हमारा वह यज्ञ हमको अधिक से अधिक प्रभावशाली व्यक्तित्व बनाने की और ले
चलता है, और एसा व्यक्ति साधारण मनुष्य से बढकर अवतारों, और देवताओं की श्रेणी में पहुँच जाता है|
इसी कारण हिन्दू धर्म या विचारधारा में यज्ञ को
सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य माना गया है, इसे केवल पूजा-पाठ विषयक
अंध धर्म कार्य कहकर उपहास में उड़ा देना उचित नहीं|
डॉ मधु सूदन व्यास
